अर्घ्यावली (सर्व तीर्थंकर, बाहुबली, सिद्ध, रत्नत्रय, देव-शास्त्र-गुरु अर्घ इ.)

नित्य नियम पूजा · अर्घ्य
देव शास्त्र गुरु  अर्घ
क्षण-भर निज-रस को पी चेतन, मिथ्या-मल को धो देता है ।
काषायिक-भाव विनष्ट किये, निज आनन्द-अमृत पीता है ॥
अनुपम-सुख तब विलसित होता, केवल-रवि जगमग करता है ।
दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह ही अर्हन्त अवस्था है ॥
यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज-गुण का अर्घ्य बनाऊंगा ।
और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाउंगा ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

सिद्ध-भगवान अर्घ
जल-फल वसुवृंदा अरघ अमंदा, जजत अनंदा के कंदा
मेटो भवफंदा सब दु:खदंदा, 'हीराचंदा' तुम वंदा ॥
त्रिभुवन के स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरयामी अभिरामी
शिवपुर-विश्रामी निजनिधि पामी, सिद्ध जजामी सिरनामी ॥
ॐ ह्रीं श्री अनाहत-पराक्रमाय सर्व-कर्म-विनिर्मुक्ताय सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा

रत्नत्रय अर्घ
सम्यक् दरशन ज्ञान, व्रत शिव-मग तीनों मयी
पार उतारन यान, 'द्यानत' पूजौं व्रत सहित ॥
ॐ ह्रीं सम्यक् रत्नत्रयाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

निर्वाणक्षेत्र अर्घ
जल गन्ध अच्छत फूल चरु फल, दीप धूपायन धरौं
'द्यानत' करो निरभय जगतसों, जोर कर विनती करौं ॥
सम्मेदगढ़ गिरनार चम्पा, पावापुरि कैलासकों
पूजों सदा चौबीस जिन, निर्वाणभूमि-निवासकों ॥

पंचकल्न्याणक अर्घ 
 उदक-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घ्यकैः
धवल-मंगल-गान-रवाकुले जिनगृहे कल्याणकमहं यजे ॥
ॐ ह्रीं श्रीभगवतो गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याणकेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

24 तीर्थंकर अर्घ 
जल फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ्य करों
तुमको अरपों भवतार, भव तरि मोक्ष वरों ॥
चौबीसों श्री जिनचन्द, आनन्द-कन्द सही
पद जजत हरत भव-फन्द, पावत मोक्ष-मही ॥
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिमहावीरान्तेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

नव देवता अर्घ 
जल गंध अक्षत पुष्प चरू, दीपक सुधूप फलार्घ ले
वर रत्नत्रय निधि लाभ यह बस अर्घ से पूजत मिले
नवदेवताओं की सदा जो भक्ति से अर्चा करें
सब सिद्धि नवनिधि ऋद्धि मंगल पाय शिवकान्ता वरें ॥
ॐ ह्रीं अरहंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्म-जिनागम-जिनचैत्य-चैत्यालयेभ्योअनर्घ पद प्राप्ताये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

श्री आदिनाथ जी अर्घ
शुचि निर्मल नीरं गंध सुअक्षत, पुष्प चरु ले मन हर्षाय,
दीप धुप फल अर्घ सुलेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय ।
श्री आदिनाथ के चरण कमल पर बलि बलि जाऊ मन वच काय,
हे करुणानिधि भव दुःख मेटो, यातै मैं पूजों प्रभु पाय ॥
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्ताये अर्घं निर्वपामिति स्वाहा ।1।

श्री अजितनाथ जी अर्घ
जलफल सब सज्जे, बाजत बज्जै, गुनगनरज्जे मनमज्जे ।
तुअ पदजुगमज्जै सज्जन जज्जै, ते भवभज्जै निजकज्जै ।। 
श्री अजित जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं ।
मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजौं ख्याता जग्गेशं ।। 
ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।2।

श्री सम्भवनाथ जी अर्घ
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप फल अर्घ किया ।
तुमको अरपौं भाव भगतिधर, जै जै जै शिव रमनि पिया ।।
संभव जिन के चरन चरचतें, सब आकुलता मिट जावे ।
निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज, निराबाध भविजन पावे ।।
ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।3।

श्री अभिनन्दन नाथ जी अर्घ
अष्ट द्रव्य संवारि सुन्दर सुजस गाय रसाल ही ।
नचत रजत जजौं चरन जुग, नाय नाय सुभाल ही ।। 
कलुषताप निकंद श्रीअभिनन्द, अनुपम चन्द हैं ।
पद वंद वृन्द जजें प्रभू, भवदंद फंद निकंद हैं ।।
ॐ ह्रीं श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।4।

श्री सुमतिनाथ जी अर्घ
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु दीप धूप फल सकल मिलाय ।
नाचि राचि शिरनाय समरचौं, जय जय जय 2 जिनराय ।। 
हरिहर वंदित पापनिकंदित, सुमतिनाथ त्रिभुवनके राय ।
तुम पद पद्म सद्म शिवदायक, जजत मुदितमन उदित सुभाय ।।
ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।5।

श्री पद्मप्रभु जी अर्घ
जल फल आदि मिलाय गाय गुन, भगति भाव उमगाय ।
जजौं तुमहिं शिवतिय वर जिनवर, आवागमन मिटाय । 
मन वचन तन त्रयधार देत ही, जनम-जरा-मृतु जाय ।
पूजौं भाव सों, श्री पदमनाथ पद-सार, पूजौं भाव सों ।।
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।6।

श्री सुपार्श्वनाथ जी अर्घ
आठों दरब साजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढ़ाय ।
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ।। 
तुम पद पूजौं मनवचकाय, देव सुपारस शिवपुरराय ।
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ।।
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।7।

श्री चंद्रप्रभु जी अर्घ
सजि आठों दरब पुनीत, आठों अंग नमौं ।
पूजौं अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गमौं ।।
श्री चंद्रनाथ दुति चंद, चरनन चंद लसै ।
मन वच तन जजत अमंद-आतम-जोति जगे ।
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।8।

श्री पुष्पदंत जी अर्घ
जल फल सकल मिलाय मनोहर, मनवचतन हुलसाय ।
तुम पद पूजौं प्रीति लाय के, जय जय त्रिभुवनराय ।।
मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदन्त जिनराय, मेरी अरज सनीजे ।।
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।9।

श्री शीतलनाथ जी अर्घ
शुभ श्री-फलादि वसु प्रासुक द्रव्य साजे ।
नाचे रचे मचत बज्जत सज्ज बाजे ।। 
रागादिदोष मल मर्द्दन हेतु येवा ।
चर्चौं पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा ।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।10।

श्री श्रेयांसनाथ जी अर्घ
जलमलय तंदुल सुमनचरु अरु दीप धूप फलावली ।
करि अरघ चरचौं चरन जुग प्रभु मोहि तार उतावली ।।
श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन वन्द आनन्दकन्द हैं ।
दुखदंद फंद निकंद पूरनचन्द जोतिअमंद हैं ।।
ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।11।

श्री वासुपूज्य जी अर्घ
जल फल दरव मिलाय गाय गुन, आठों अंग नमाई ।
शिवपदराज हेत हे श्रीपति! निकट धरौं यह लाई । ।
वासुपूज्य वसुपूज-तनुज-पद, वासव सेवत आई ।
बाल ब्रह्मचारी लखि जिन को, शिव तिय सनमुख धाई ।।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।12।

श्री विमलनाथ जी अर्घ
आठों दरब संवार, मनसुखदायक पावने ।
जजौं अरघ भर थार, विमल विमल शिवतिय रमण ।।
ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।13।

श्री अनन्तनाथ जी अर्घ
शुचि नीर चन्दन शालिशंदन, सुमन चरु दीवा धरौं ।
अरु धूप फल जुत अरघ करि, करजोरजुग विनति करौं ।।
जगपूज परम पुनीत मीत, अनंत संत सुहावनो ।
शिव कंत वंत मंहत ध्यावौं, भ्रंत वन्त नशावनो ।।
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेद्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।14।

श्री धर्मनाथ जी अर्घ
आठों दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुनगाई ।
बाजत दृमदृम दृम मृदंग गत, नाचत ता थेई थाई ।।
परमधरम-शम-रमन धरम-जिन, अशरन शरन निहारी ।
पूजौं पाय गाय गुन सुन्दर नाचौं दे दे तारी ।।
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।15।

श्री शांतिनाथ जी अर्घ
वसु द्रव्य सँवारी, तुम ढिग धारी, आनन्दकारी, दृग-प्यारी ।
तुम हो भव तारी, करुनाधारी, या तें थारी शरनारी ।।
श्री शान्ति जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं ।
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं, मक्रेशं ।।
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।16।

श्री कुन्थुनाथ जी अर्घ
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप लेरी ।
फलजुत जनन करौं मन सुख धरि, हरो जगत फेरी ।।
कुंथु सुन अरज दास केरी, नाथ सुन अरज दासकेरी ।
भवसिन्धु पर्यो हौं नाथ, निकारो बांह पकर मेरी ।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।17।

श्री अरहनाथ जी अर्घ
सुचि स्वच्छ पटीरं, गंधगहीरं, तंदुलशीरं, पुष्प-चरुं ।
वर दीपं धूपं, आनंदरुपं, ले फल भूपं, अर्घ करुं ।।
प्रभु दीन दयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं सुकुमालं ।
हरि मम जंजालं, हे जगपालं, अरगुन मालं, वरभालं ।।
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।18।

श्री मल्लिनाथ जी अर्घ
जल फल अरघ मिलाय गाय गुन, पूजौं भगति बढ़ाई ।
शिवपदराज हेत हे श्रीधर, शरन गहो मैं आई ।।
राग-दोष-मद-मोह हरन को, तुम ही हो वरवीरा ।
यातें शरन गही जगपतिजी, वेगि हरो भवपीरा ।।
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।19।

श्री मुनिसुव्रतनाथ जी अर्घ
जलगंध आदि मिलाय आठों दरब अरघ सजौं वरौं ।
पूजौं चरन रज भगतिजुत, जातें जगत सागर तरौं ।।
शिवसाथ करत सनाथ सुव्रतनाथ, मुनिगुन माल हैं ।
तसु चरन आनन्दभरन तारन तरन, विरद विशाल हैं ।।
ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।20।

श्री नमिनाथ जी अर्घ
जल फलादि मिलाय मनोहरं, अरघ धारत ही भवभय हरं ।
जजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ।।
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।21।

श्री नेमिनाथ जी अर्घ
जल फल आदि साज शुचि लीने, आठों दरब मिलाय ।
अष्टम छिति के राज कारन को, जजौं अंग वसु नाय ।।
दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता0 । 
ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

पार्श्वनाथ-भगवान जी अर्घ 
नीर गंध अक्षतान पुष्प चारु लीजिये
दीप धूप श्रीफलादि अर्घ तैं जजीजिये ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

महावीर-भगवान जी अर्घ 
जल फल वसु सजि हिम थार, तन मन मोद धरौं
गुण गाऊँ भवदधितार, पूजत पाप हरौं ॥
श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो
जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मतिदायक हो ॥
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

श्री बाहुबली स्वामी अर्घ्यं
हूँ शुद्ध निराकुल सिद्धों सम, भवलोक हमारा वासा ना॥
रिपु राग रु द्वेष लगे पीछे, यातैं शिवपद को पाया ना॥
निज के गुण निज में पाने को, प्रभु अर्घ संजोकर लाया हूँ।
हे बाहुबली तुम चरणों में, सुख सन्मति पाने आया हूँ॥

ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलिजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा॥

पंच-बालयति अर्घ्य
सजि वसुविधि द्रव्य मनोज्ञ अर्घ बनावत हैं।
वसुकर्म अनादि संयोग, ताहि नशावत हैं॥
श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अती।
नमूँ मन-वच-तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति॥
ॐ ह्रीं श्रीपंचबालयतितीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्याचा सोपा भावार्थ:
पंच बालयति: जैन परंपरेत श्री वासुपूज्य स्वामी, भगवान मल्लिनाथ, भगवान नेमिनाथ, भगवान पार्श्वनाथ आणि भगवान महावीर या पाच तीर्थंकरांनी बालवयातच/अल्पवयातच गृहस्थाश्रमाचा त्याग करून दीक्षा घेतली होती, म्हणूनच त्यांना 'पंच बालयति' म्हटले जाते.

भावार्थ: आठ प्रकारच्या (वसुविध) उत्तम द्रव्यांनी सुंदर असा अर्घ्य सजवून मी अर्पण करतो, जो अनादी काळापासून आत्म्यासोबत जोडलेल्या आठ कर्मांचा (वसुकर्म) नाश करतो. वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ आणि महावीर या पाच बालयती तीर्थंकरांना मी मन, वचन आणि कायेने (शरीराने) प्रेमादरपूर्वक वंदन करतो.

अधोलोक अर्घ्य
जयाध्वहू भवनेश्वरादि भवन, 'ज्ञानक' ज्ञान धरी क्षण एक।
महापुण्य ही, जप जप नाचे आज सुक॥
भवनत्रिादि भावना लाय, शीलाद् जीवेन्द्रकाय नमाय।
महापुण्य ही, जप जप नाचे आज सुक॥
ॐ ह्रीं अधोलोकस्थित-जिनालय-जिनप्रतिमाभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मध्यलोक अर्घ्य
आज मध्यलोक आया महान, 'ज्ञानक' पूजी अतिशयवान।
महापुण्य ही, देखि देखि आज सुक होय॥
द्विद्वीप ईहा आदि जिनालय, सब प्रतिमा को करों प्रणाम।
महापुण्य ही, देखि देखि आज सुक होय॥
ॐ ह्रीं मध्यलोकस्थित-अकृत्रिम-कृत्रिम-जिनालय-जिनप्रतिमाभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

नंदीश्वरद्वीप अर्घ्य
ग्रह आज मिले नंदीश्वर, सुखको आस्वादु हो।
'ज्ञानक' कीजयो नंदीश्वर, भूमि प्रणामहुँ हो॥
बावन्नहू जिनालय, बावन पूज करों।
अष्टान्हिका अविनाश, अनहद भाव भरों॥
( नंदीश्वरद्वीप महान् अष्टाह्निका होय।
महापुण्य ही, देखि देखि आज सुक होय॥ )
ॐ ह्रीं नंदीश्वरद्वीपे अकृत्रिम-जिनालयेभ्यो जिनप्रतिमाभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम क्षमा अर्घ्य
क्रोधाग्नि शांत, 'ज्ञानक' अभय समाधि।
नसैं समस्त विकार, दश-लक्षण पूजी आज॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मांगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन) अर्घ्यं
आतम-द्रव्य निहारन, उत्तम श्री सम्यक् लियै।
जन्म रोग निवारन सम्यक् रत्नत्रय भजै॥
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनरत्नाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निर्वाणक्षेत्र अर्घ्यं
जल गंध अक्षत फूल फल फल, दीप धूपायन धरूँ।
'ज्ञानक' भजै निजभाव जल सों, मोह का निसरो करूँ॥
सम्मेदगढ़ गिरनार चंपा, पावापुर कैलाष को।
पूजौं सदा चौबीस जिन, निर्वाण भूमि निवास को॥
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थंकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

ऋषिार्य अर्घ्यं
जल गंध अक्षत पुष्प चरू कर, दीप धूप सु लावना।
फल सरस आठों द्रव्य मिश्रित, अर्घ सोजै पावना॥
आर्यादि चारित्रारूढ़ धार्य, मुनिन की पूजा करूँ।
ता सों परमानंद होय, अक्षम आनंद विलसौं॥
ॐ ह्रीं श्रीचारित्रारूढ़ेभ्यः सर्वसाधुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सरस्वती (जिनवाणी) अर्घ्यं
जल चन्दन अक्षत पुष्प चरू, फल दीप धूप अति मान लावै।
पूजा को आवत जो भव प्राणी, सो नर 'ज्ञानक' सुजस गावै॥
तीर्थंकर की वाणी सुखदाई, अंग चौदह भुवि प्रगटाई।
सो जिनवर वाणी हितकारी, (श्रुतपंचमी) पूजन करी॥
ॐ ह्रीं श्रीद्वादशांगजिनवाणीमात्रे अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सरस्वती
जल चंदन अक्षत, फूल चरु अरु, दीप धूप अति फल लावे
पूजा को ठानत, जो तुम जानत, सो नर 'द्यानत' सुखपावे ॥
तीर्थंकर की ध्वनि, गणधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमई
सो जिनवरवानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवनमानी पूज्य भई ॥
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भव-सरस्वतीदेव्यै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा


सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र
नीर चन्दन अक्षत अनूप पुष्प लावै, अति मन भावै।
वर धूप दीप मिष्ठान्न फल सो, सिद्ध क्षेत्र में शीश नवावै॥
मिटे दुर्गति संतत संसारी, प्रभु की सेवा परम सुखदायी।
सम्मेदगढ़ पर बीस जिनवर, मुक्ति गये तिनहि ध्यावै॥
ॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


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